पेग़म्बरों का उद्देश्य

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رَّبِّ اَعُوۡذُ بِکَ مِنۡ ھَمَزٰتِ الشَّیٰطِیۡنِ ۙ وَ اَعُوۡذُ بِکَ رَبِّ اَنۡ یَّحۡضُرُوۡن ؕ ۔

بِسۡمِ اللّٰهِ الرَّحۡمٰنِ الرَّحِيۡمِۙ۔

            वास्तव में, अल्लाह फ़रिश्तों में से जिस को चाहता है। अपने मामलों को अंजाम देने के लिये चुनता है और वह लोगों में से पेग़म्बरों को चुनता है जिसे वह चाहता है, ताकि वह लोगों को संदेश सुनाए। और तौहीद का वचन, आदेश और तराजू [न्याय स्थापित करने के तरीके], जो वहयी (प्रकाशना) के माध्यम से उन पर प्रकट हो, लोगों तक  उन्हीं की भाषा में पहुँचाये। ताकि क़यामत के दिन कोई बहुदेववादी या पाखंडी यह न कह सके कि हम नहीं जानते थे, नहीं तो हम भी आपकी पूजा करते। और शैतान को अपना मित्र नहीं बनाते।  

             अल्लाह के नबियों का जीवन  उसी वहयी (प्रकाशना) पर आधारित होता हैं जो उन पर प्रकट होती है। हैं और वह उसी वहयी (प्रकाशना) का उपदेश देते हैं।


अल्लाह नबीयों को संदेशवाहक के रूप मे चुनता है।

وَمَا نُرۡسِلُ الۡمُرۡسَلِيۡنَ اِلَّا مُبَشِّرِيۡنَ وَمُنۡذِرِيۡنَ ۚ وَيُجَادِلُ الَّذِيۡنَ كَفَرُوۡا بِالۡبَاطِلِ لِـيُدۡحِضُوۡا بِهِ الۡحَـقَّ‌ وَاتَّخَذُوۡۤا اٰيٰتِىۡ وَمَاۤ اُنۡذِرُوۡا هُزُوًا‏ ﴿۵۶﴾۔  

[Q-18:56-57]

          तथा हम पेग़म्बरों को नहीं भेजते, परन्तु [इसलिए कि] शुभ सूचना देने वाले और सावधान करने वाले बनाकर। और जो काफ़िर हैं, असत्य (अनृत) के सहारे विवाद करते हैं, ताकि उसके द्वारा वे सत्य को नीचा दिखायें और उन्होंने बनाया हमारी आयतों को तथा जिस बात की उन्हें चेतावनी दी गई है, परिहास (मज़ाक़) बना लिया है। (56)


اَللّٰهُ يَصۡطَفِىۡ مِنَ الۡمَلٰٓٮِٕكَةِ رُسُلًا وَّمِنَ النَّاسِ‌ؕ اِنَّ اللّٰهَ سَمِيۡعٌۢ بَصِيۡرٌ ۚ‏ (۷۵)  يَعۡلَمُ مَا بَيۡنَ اَيۡدِيۡهِمۡ وَمَا خَلۡفَهُمۡ‌ؕ وَاِلَى اللّٰهِ تُرۡجَعُ الۡاُمُوۡرُ‏ ﴿۷۶﴾۔ 

[Q-22:75-76]

            अल्लाह ही फ़रिश्तों में से तथा मनुष्यों में से संदेश वाहक (रसूल) निर्वाचित करता है। वास्तव में, वह सुनने तथा देखने  वाला है।(75) वह जानता है, जो उनके सामने है और जो कुछ उनसे ओझल है और सब काम अल्लाह ही की और फेरे जाते हैं। (76)


اِنَّاۤ اَوۡحَيۡنَاۤ اِلَيۡكَ كَمَاۤ اَوۡحَيۡنَاۤ اِلٰى نُوۡحٍ وَّالنَّبِيّٖنَ مِنۡۢ بَعۡدِهٖ‌ۚ وَاَوۡحَيۡنَاۤ اِلٰٓى اِبۡرٰهِيۡمَ وَاِسۡمٰعِيۡلَ وَاِسۡحٰقَ وَيَعۡقُوۡبَ وَالۡاَسۡبَاطِ وَعِيۡسٰى وَاَيُّوۡبَ وَيُوۡنُسَ وَهٰرُوۡنَ وَسُلَيۡمٰنَ‌  ۚ  وَاٰتَيۡنَا دَاوٗدَ زَبُوۡرًا  ۚ (۱۶۳)  وَرُسُلًا قَدۡ قَصَصۡنٰهُمۡ عَلَيۡكَ مِنۡ قَبۡلُ وَرُسُلًا لَّمۡ نَقۡصُصۡهُمۡ عَلَيۡكَ‌ۚ  وَكَلَّمَ اللّٰهُ مُوۡسٰى تَكۡلِيۡمًا  ۚ‏ (۱۶۴)  رُسُلًا مُّبَشِّرِيۡنَ وَمُنۡذِرِيۡنَ لِئَلَّا يَكُوۡنَ لِلنَّاسِ عَلَى اللّٰهِ حُجَّةٌ ۢ بَعۡدَ الرُّسُلِ‌ؕ وَكَانَ اللّٰهُ عَزِيۡزًا حَكِيۡمًا‏ ﴿۱۶۵﴾۔

[Q-4:163-165]

             हे नबी!) हमने आपकी ओर वैसे ही वह़्यी भेजी है, जैसे नूह़ और उसके पश्चात के नबियों के पास भेजी और इब्राहीम, और इस्माईल, और इस्ह़ाक़, और याक़ूब तथा उसकी संतान, और ईसा, और अय्यूब, और यूनुस, और हारून और सुलैमान के पास वह़्यी भेजी और हमने दाऊद को ज़बूर प्रदान की थी।(163) कुछ रसूल तो ऐसे हैं, जिनकी चर्चा हम इससे पहले आपसे कर चुके हैं और कुछ की चर्चा आपसे नहीं की है और अल्लाह ने मूसा से वास्तव में बात की।(164) ये सभी रसूल शुभ सूचना सुनाने वाले और डराने वाले थे, ताकि इन रसूलों के (आगमन के) पश्चात् लोगों के लिए अल्लाह पर कोई तर्क न रह जाये। और अल्लाह प्रभुत्वशाली तत्वज्ञ (ग़ालिब हिकमत वाला) है।(165)


وَلَٮِٕنۡ شِئۡنَا لَنَذۡهَبَنَّ بِالَّذِىۡۤ اَوۡحَيۡنَاۤ اِلَيۡكَ ثُمَّ لَا تَجِدُ لَـكَ بِهٖ عَلَيۡنَا وَكِيۡلًا ۙ‏ (۸۶)  اِلَّا رَحۡمَةً مِّنۡ رَّبِّكَ ؕ اِنَّ فَضۡلَهٗ كَانَ عَلَيۡكَ كَبِيۡرًا‏ ﴿۸۷﴾۔

[Q-17:86-87]

         और यदि हम चाहें, तो वह सब कुछ [वापस] ले जायें, जो आपकी ओर हमने वह़्यी किया है, फिर आप हमपर अपना कोई सहायक नहीं पायेंगे। (86) किन्तु आपके रब की दया के कारण (ये आपको प्राप्त है)। वास्तव में, आपपर उसकी बहुत बड़ी इनायत (क्रपा) है।(87)

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नबियों (दूतों) को भेजने का उद्देश्य।

كَذٰلِكَ اَرۡسَلۡنٰكَ فِىۡۤ اُمَّةٍ قَدۡ خَلَتۡ مِنۡ قَبۡلِهَاۤ اُمَمٌ لِّـتَتۡلُوَا۟ عَلَيۡهِمُ الَّذِىۡۤ اَوۡحَيۡنَاۤ اِلَيۡكَ وَ هُمۡ يَكۡفُرُوۡنَ بِالرَّحۡمٰنِ‌ؕ قُلۡ هُوَ رَبِّىۡ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ ۚ عَلَيۡهِ تَوَكَّلۡتُ وَاِلَيۡهِ مَتَابِ‏ ﴿۳۰﴾۔

[Q-13:30]

            इसी प्रकार, हमने आपको एक समुदाय में जिससे पहले बहुत-से समुदाय गुज़र चुके हैं रसूल बनाकर भेजा है, ताकि आप उन्हें वो संदेश सुनाएँ, जो हमने आपकी ओर वह़्यी द्वारा भेजा है और वे रहमान (अत्यंत कृपाशील) को अस्वीकार करते हैं? आप कह दें वही मेरा रब है, उसके सिवा कोई पूज्य नहीं। मैंने उसीपर भरोसा किया है और उसी की ओर मुझे जाना है। “30”


هٰذَا نَذِيۡرٌ مِّنَ النُّذُرِ الۡاُوۡلٰٓى‏ ﴿۵۶﴾۔

[Q-53:56]

             ये  ﷺ भी एक सचेतकर्ता है, प्रथम सचेतकर्ताओं के जैसे। (56)

अर्थात मुह़म्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) भी एक रसूल हैं प्रथम रसूलों के समान।


وَمَاۤ اَرۡسَلۡنَا مِنۡ رَّسُوۡلٍ اِلَّا لِـيُـطَاعَ بِاِذۡنِ اللّٰهِ ‌ؕ۔

[Q-04:64]

          और हमने नहीं भेजा कोई रसूल, मगर इसलिए कि! अल्लाह की [आज्ञा] का पालन किया जाये। (64)


نَحۡنُ اَعۡلَمُ بِمَا يَقُوۡلُوۡنَ‌ وَمَاۤ اَنۡتَ عَلَيۡهِمۡ بِجَـبَّارٍ  ࣞ‌ فَذَكِّرۡ بِالۡقُرۡاٰنِ مَنۡ يَّخَافُ وَعِيۡدِ ﴿۴۵﴾۔

[Q-50:45]

            तथा हम भली-भाँति जानते हैं उसे, जो कुछ वे कह रहे हैं और आप उन्हें बलपूर्वक मनवाने के लिए नहीं हैं। तो आप उन्हे क़ुर्आन द्वारा शिक्षा (नसीहत) दें, जो मेरी यातना (अज़ाब) से डरता हो। (45)


وَاَنۡ اَتۡلُوَا الۡقُرۡاٰنَ‌ۚ فَمَنِ اهۡتَدٰى فَاِنَّمَا يَهۡتَدِىۡ لِنَفۡسِهٖ‌ۚ وَمَنۡ ضَلَّ فَقُلۡ اِنَّمَاۤ اَنَا مِنَ الۡمُنۡذِرِيۡنَ‏ ﴿۹۲﴾۔

[Q-27:92]

            तथा क़ुर्आन पढ़ते रहो, तो जिसने [क़ुरान पढ़कर] सुपथ अपनाया, तो उसने अपने ही लाभ के लिए सुपथ अपनाया। और जो कुपथ हो जाये, तो आप कह दें कि वास्तव में, मैं तो बस सावधान करने वालों में से हूँ।(1)


وَمَا نُرۡسِلُ الۡمُرۡسَلِيۡنَ اِلَّا مُبَشِّرِيۡنَ وَمُنۡذِرِيۡنَ‌ۚ فَمَنۡ اٰمَنَ وَاَصۡلَحَ فَلَا خَوۡفٌ عَلَيۡهِمۡ وَلَا هُمۡ يَحۡزَنُوۡنَ﴿۴۸﴾۔

[Q-06:48]

         और हम रसूलों को नहीं भेजते हैं मगर [इसलिए कि] वे (आज्ञाकारियों को) शुभ सूचना दें तथा (अवज्ञाकारियों को) डरायें। तो जो ईमान लाये तथा अपने कर्म सुधार लें, उनके लिए कोई भय नहीं और न वह उदासीन होंगे।(48)


كَذٰلِكَ اَرۡسَلۡنٰكَ فِىۡۤ اُمَّةٍ قَدۡ خَلَتۡ مِنۡ قَبۡلِهَاۤ اُمَمٌ لِّـتَتۡلُوَا۟ عَلَيۡهِمُ الَّذِىۡۤ اَوۡحَيۡنَاۤ اِلَيۡكَ﴿۳۰﴾۔

[Q-13:30]

         इसी प्रकार, हमने आपको एक समुदाय (उम्मत) में जिससे पहले बहुत-से समुदाय (उम्मत) गुज़र चुके हैं रसूल बनाकर भेजा है, ताकि आप उन्हें वो संदेश सुनाएँ, जो हमने आपकी ओर वह़्यी द्वारा भेजा है।(30)


مَا عَلَى الرَّسُوۡلِ اِلَّا الۡبَلٰغُ‌ ؕ وَاللّٰهُ يَعۡلَمُ مَا تُبۡدُوۡنَ وَمَا تَكۡتُمُوۡنَ‏ ﴿۹۹﴾۔

[Q-05:99]

            रसूल का दायित्व इसके सिवा कुछ नहीं कि उपदेश पहुँचा दे, और अल्लाह! जो तुम बोलते हो और जो मन में रखते हो, सब जानता है।(99)


وَبِالۡحَـقِّ اَنۡزَلۡنٰهُ وَبِالۡحَـقِّ نَزَلَ‌ ؕ وَمَاۤ اَرۡسَلۡنٰكَ اِلَّا مُبَشِّرًا وَّنَذِيۡرًا ‌ۘ‏ ﴿۱۰۵﴾۔

[Q-17:105]

          और हमने सत्य के साथ ही इस (क़ुर्आन) को उतारा है तथा ये सत्य के साथ ही उतरा है और हमने आपको बस शुभ सूचना देने तथा सावधान करने वाला बनाकर भेजा है।(105)


كِتٰبٌ اُنۡزِلَ اِلَيۡكَ فَلَا يَكُنۡ فِىۡ صَدۡرِكَ حَرَجٌ مِّنۡهُ لِتُنۡذِرَ بِهٖ وَذِكۡرٰى لِلۡمُؤۡمِنِيۡنَ‏ ﴿۲﴾۔

[Q-07:02]

         ये पुस्तक है, जो आपकी ओर उतारी गयी है। अतः (हे नबी!) आपके मन में इससे कोई संकोच न हो, ताकि आप इसके द्वारा सावधान करें और (यह) ईमान वालों के लिए उपदेश (नसीहत) है।(2)


اِنَّاۤ اَرۡسَلۡنٰكَ شَاهِدًا وَّمُبَشِّرًا وَّنَذِيۡرًا (۸) لِّـتُؤۡمِنُوۡا بِاللّٰهِ وَ رَسُوۡلِهٖ وَتُعَزِّرُوۡهُ وَتُوَقِّرُوۡهُ ؕ وَتُسَبِّحُوۡهُ بُكۡرَةً وَّاَصِيۡلًا‏ ﴿۹﴾۔

[Q-48:8-9]

            (हे नबी!) हमने भेजा है आपको गवाह बनाकर तथा शुभ सूचना देने एवं सावधान करने वाला बनाकर।(8) ताकि तुम ईमान लाओ अल्लाह एवं उसके रसूल पर और उनकी सहायता करो तथा आदर करो। और अल्लाह की पवित्रता का वर्णन प्रातः तथा संध्या करते रहो। (9)


وَمَا يَسۡتَوِى الۡاَعۡمٰى وَالۡبَصِيۡرُ ۙ‏ ﴿۱۹﴾  وَلَا الظُّلُمٰتُ وَلَا النُّوۡرُ ۙ‏ ﴿۲۰﴾  وَلَا الظِّلُّ وَلَا الۡحَـرُوۡرُ ۚ‏ ﴿۲۱﴾  وَمَا يَسۡتَوِى الۡاَحۡيَآءُ وَلَا الۡاَمۡوَاتُ ؕ اِنَّ اللّٰهَ يُسۡمِعُ مَنۡ يَّشَآءُ ۚ وَمَاۤ اَنۡتَ بِمُسۡمِعٍ مَّنۡ فِى الۡقُبُوۡرِ‏ ﴿۲۲﴾  اِنۡ اَنۡتَ اِلَّا نَذِيۡرٌ‏ ﴿۲۳﴾  اِنَّاۤ اَرۡسَلۡنٰكَ بِالۡحَـقِّ بَشِيۡرًا وَّنَذِيۡرًاؕ وَاِنۡ مِّنۡ اُمَّةٍ اِلَّا خَلَا فِيۡهَا نَذِيۡرٌ‏ ﴿۲۴﴾۔

[Q-35:19-24]

             तथा समान नहीं हो सकता अंधा तथा आँख वाला।(19) और न अंधकार तथा प्रकाश।(20) और न छाया और धूप।(21) तथा समान नहीं हो सकते जीवित तथा निर्जीव। वास्तव में, अल्लाह ही सुनाता है जिसे चाहता है और आप नहीं सुना सकते उन्हें, जो क़ब्रों में सो रहे हों।(22) आप तो बस डराने (सचेतकर्ता) वाले हैं।(23) वास्तव में, हमने आपको सत्य के साथ शुभ सूचक तथा सचेतकर्ता बनाकर भेजा है और कोई ऐसी उम्मत (समुदाय) नहीं, कि जिसमें कोई सचेतकर्ता न आया हो।


لَـقَدۡ اَرۡسَلۡنَا رُسُلَنَا بِالۡبَيِّنٰتِ وَاَنۡزَلۡنَا مَعَهُمُ الۡكِتٰبَ وَالۡمِيۡزَانَ لِيَقُوۡمَ النَّاسُ بِالۡقِسۡطِ ۚ  ﴿۲۵﴾۔

[Q-57:25]

            निःसंदेह, हमने अपने रसूलों को खुले प्रमाणों के साथ भेजा, तथा उनके साथ पुस्तक तथा तुला (न्याय के नियम), उतारी। ताकि लोग न्याय पर स्थित रहें।“25”


اِنَّاۤ اَوۡحَيۡنَاۤ اِلَيۡكَ كَمَاۤ اَوۡحَيۡنَاۤ اِلٰى نُوۡحٍ وَّالنَّبِيّٖنَ مِنۡۢ بَعۡدِهٖ‌ۚ وَاَوۡحَيۡنَاۤ اِلٰٓى اِبۡرٰهِيۡمَ وَاِسۡمٰعِيۡلَ وَاِسۡحٰقَ وَيَعۡقُوۡبَ وَالۡاَسۡبَاطِ وَعِيۡسٰى وَاَيُّوۡبَ وَيُوۡنُسَ وَهٰرُوۡنَ وَسُلَيۡمٰنَ‌  ۚ  وَاٰتَيۡنَا دَاوٗدَ زَبُوۡرًا  ۚ (۱۶۳)  وَرُسُلًا قَدۡ قَصَصۡنٰهُمۡ عَلَيۡكَ مِنۡ قَبۡلُ وَرُسُلًا لَّمۡ نَقۡصُصۡهُمۡ عَلَيۡكَ‌ۚ  وَكَلَّمَ اللّٰهُ مُوۡسٰى تَكۡلِيۡمًا  ۚ‏ (۱۶۴)  رُسُلًا مُّبَشِّرِيۡنَ وَمُنۡذِرِيۡنَ لِئَلَّا يَكُوۡنَ لِلنَّاسِ عَلَى اللّٰهِ حُجَّةٌ ۢ بَعۡدَ الرُّسُلِ‌ؕ وَكَانَ اللّٰهُ عَزِيۡزًا حَكِيۡمًا‏ (۱۶۵)۔

[Q-4:163-165]

          (हे नबी!) हमने आपकी ओर वैसे ही वह़्यी भेजी है, जैसे नूह़ और उसके पश्चात के नबियों के पास भेजी और इब्राहीम, और इस्माईल, और इस्ह़ाक़, और याक़ूब तथा उसकी संतान, और ईसा, और अय्यूब, और यूनुस, और हारून और सुलैमान के पास वह़्यी भेजी और हमने दाऊद को ज़बूर प्रदान की थी।(163) कुछ रसूल तो ऐसे हैं, जिनकी चर्चा हम इससे पहले आपसे कर चुके हैं और कुछ की चर्चा आपसे नहीं की है और अल्लाह ने मूसा से वास्तव में बात की।(164) ये सभी रसूल शुभ सूचना सुनाने वाले और डराने वाले थे, ताकि इन रसूलों के (आगमन के) पश्चात् लोगों के लिए अल्लाह पर कोई तर्क न रह जाये। और अल्लाह प्रभुत्वशाली तत्वज्ञ (ग़ालिब हिकमत वाला) है।(165)


يٰۤـاَيُّهَا الرَّسُوۡلُ بَلِّغۡ مَاۤ اُنۡزِلَ اِلَيۡكَ مِنۡ رَّبِّكَ‌ ؕ وَاِنۡ لَّمۡ تَفۡعَلۡ فَمَا بَلَّغۡتَ رِسٰلَـتَهٗ ؕ‌﴿۶۷﴾۔

[Q-5:67]

        हे रसूल!  जो कुछ आपपर आपके रब की ओर से उतारा गया है, उसे (सबको) पहुँचा दें और यदि ऐसा नहीं किया, तो आपने उसका उपदेश नहीं पहुँचाया। (67)


الۤرٰ ࣞ كِتٰبٌ اَنۡزَلۡنٰهُ اِلَيۡكَ لِـتُخۡرِجَ النَّاسَ مِنَ الظُّلُمٰتِ اِلَى النُّوۡرِ ۙ  بِاِذۡنِ رَبِّهِمۡ اِلٰى صِرَاطِ الۡعَزِيۡزِ الۡحَمِيۡدِۙ‏ (۱)  اللّٰهِ الَّذِىۡ لَهٗ مَا فِى السَّمٰوٰتِ وَمَا فِى الۡاَرۡضِ‌ؕ ﴿۲﴾۔

[Q-14:1-2]

            अलिफ़, लाम, रा। ये (क़ुर्आन) एक पुस्तक है, जिसे हमने आपकी ओर अवतरित (नाज़िल) किया है, ताकि आप [इस के माध्यम से] लोगों को अंधेरों से निकालकर प्रकाश की ओर लायें। उनके रब की अनुमति से, उस रब की राह की ओर, जो बड़ा प्रबल सराहा हुआ है।(1)वह रब जिसके अधिकार में आकाश और धरती का सब कुछ है (2)


وَقَالُوۡا لَوۡلَاۤ اُنۡزِلَ عَلَيۡهِ اٰيٰتٌ مِّنۡ رَّبِّهٖ‌ؕ قُلۡ اِنَّمَا الۡاٰيٰتُ عِنۡدَ اللّٰه ِؕ وَاِنَّمَاۤ اَنَا۟ نَذِيۡرٌ مُّبِيۡنٌ‏ ﴿۵۰﴾۔

[Q-29:50]

            तथा (अत्याचारियों) ने कहाः आपपर आप के रब की ओर से निशानियाँ क्यों नहीं उतारी गयीं? आप कह दें कि निशानियाँ तो अल्लाह के पास  हैं और मैं तो खुला सावधान करने वाला हूँ।

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अल्लाह नबी को अपनी स्तिथि स्पष्ट करने का हुक्म देता है।

قُلْ لَّاۤ اَقُوۡلُ لَـكُمۡ عِنۡدِىۡ خَزَآٮِٕنُ اللّٰهِ وَلَاۤ اَعۡلَمُ الۡغَيۡبَ وَلَاۤ اَقُوۡلُ لَـكُمۡ اِنِّىۡ مَلَكٌ‌ ۚ اِنۡ اَتَّبِعُ اِلَّا مَا يُوۡحٰٓى اِلَىَّ‌ ؕ قُلۡ هَلۡ يَسۡتَوِى الۡاَعۡمٰى وَالۡبَصِيۡرُ‌ ؕ اَفَلَا تَتَفَكَّرُوۡنَ ﴿۵۰﴾۔

[Q-06:50]

            (हे नबी!) आप कह दें कि मेरे पास अल्लाह का कोष (खज़ाना) नहीं है, न मैं परोक्ष (ग़ैब) का ज्ञान रखता हूँ। और न मैं ये कहता हूँ कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। मैं तो केवल उसी पर चल रहा हूँ, जो मेरी ओर वह़्यी (प्रकाशना) की जा रही है। आप ﷺ कहें कि क्या अंधा तथा आँख वाला बराबर हो जायेंगे? क्या तुम सोच विचार नहीं करते?


قُلۡ اِنَّمَاۤ اَنَا بَشَرٌ مِّثۡلُكُمۡ يُوۡحٰٓى اِلَىَّ اَنَّمَاۤ اِلٰهُكُمۡ اِلٰـهٌ وَّاحِدٌ‌  ۚ فَمَنۡ كَانَ يَرۡجُوۡالِقَآءَ رَبِّهٖ فَلۡيَـعۡمَلۡ عَمَلًا صَالِحًـاوَّلَايُشۡرِكۡ بِعِبَادَةِ رَبِّهٖۤ اَحَدًا ﴿۱۱۰﴾۔

[Q-18:110]

            आप कह देः मैं केवल तुम जैसा एक मनुष्य पुरुष हूँ, मेरी ओर प्रकाशना (वह़्यी) की जाती है कि तुम्हारा पूज्य एक ही पूज्य है। अतः, जो अपने पालनहार से मिलने की आशा रखता हो, उसे चाहिए कि सदाचार करे और अपने रब की इबादत (वंदना) में किसी को साझी न बनाये।(110)


قُلۡ سُبۡحَانَ رَبِّىۡ هَلۡ كُنۡتُ اِلَّا بَشَرًا رَّسُوۡلًا‏ (۹۳)  وَمَا مَنَعَ النَّاسَ اَنۡ يُّؤۡمِنُوۡۤا اِذۡ جَآءَهُمُ الۡهُدٰٓى اِلَّاۤ اَنۡ قَالُـوۡۤا اَبَعَثَ اللّٰهُ بَشَرًا رَّسُوۡلًا‏ ﴿۹۴﴾  قُلْ لَّوۡ كَانَ فِى الۡاَرۡضِ مَلٰۤٮِٕكَةٌ يَّمۡشُوۡنَ مُطۡمَٮِٕنِّيۡنَ لَـنَزَّلۡنَا عَلَيۡهِمۡ مِّنَ السَّمَآءِ مَلَـكًا رَّسُوۡلًا‏ ﴿۹۵﴾۔ 

[Q-17:93-95]

           आप कह दें कि मेरा पालनहार पवित्र है, मैं तो बस एक रसूल (संदेशवाहक) मनुष्य हूँ।(93) और नहीं रोका लोगों को, कि वोह ईमान लायें जब कि लोगों के पास मार्गदर्शन (क़ुरान) आ गया, परंतु यह कि उन्होंने [अहंकार मे] कहाः क्या अल्लाह ने एक मनुष्य को रसूल बनाकर भेजा है?(94) (हे नबी!) आप कह दें कि यदि धरती में फ़रिश्ते निश्चिन्त होकर चलते-फिरते होते, तो हम अवश्य उनपर आकाश से कोई फ़रिश्ता रसूल बनाकर उतारते। (95)


قُلۡ اِنۡ ضَلَلۡتُ فَاِنَّمَاۤ اَضِلُّ عَلٰى نَـفۡسِىۡ ۚ وَاِنِ اهۡتَدَيۡتُ فَبِمَا يُوۡحِىۡۤ اِلَىَّ رَبِّىۡ ؕ اِنَّهٗ سَمِيۡعٌ قَرِيۡبٌ‏ ﴿۵۰﴾۔

[Q-34:50]

          कहो, “यदि मैं पथभ्रष्ट हो जाऊँ तो पथभ्रष्ट होकर मैं अपना ही बुरा करूँगा, और यदि मैं सीधे मार्ग पर हूँ, तो इसका कारण वह प्रकाशना [क़ुरान] है जो मेरा रब मेरी ओर करता है। निस्संदेह वह सब कुछ सुनता है, (और) निकट है।” (50)


وَلَقَدۡ اَرۡسَلۡنَا رُسُلًا مِّنۡ قَبۡلِكَ وَ جَعَلۡنَا لَهُمۡ اَزۡوَاجًا وَّذُرِّيَّةً ‌ ؕ وَمَا كَانَ لِرَسُوۡلٍ اَنۡ يَّاۡتِىَ بِاٰيَةٍ اِلَّا بِاِذۡنِ اللّٰهِ‌ ؕ لِكُلِّ اَجَلٍ كِتَابٌ‏ (۳۸)  يَمۡحُوۡا اللّٰهُ مَا يَشَآءُ وَيُثۡبِتُ ‌ۖ ‌ۚ وَعِنۡدَهٗۤ اُمُّ الۡكِتٰبِ‏ ﴿۳۹﴾۔ 

[Q-13:38-39]

          और हमने आपसे पहले बहुत-से रसूलों को भेजा है और उनकी पत्नियाँ तथा बाल-बच्चे भी  बनाये। किसी रसूल के बस में नहीं है कि अल्लाह की अनुमति बिना कोई निशानी (मोज़्जा) ले आये। और हर दौर (समय) के लिए एक पुस्तक (आदेश) है।(38) वह जो (आदेश) चाहे, मिटा देता है और जो चाहे, शेष (साबित) रखता है। उसी के पास मूल  पुस्तक (लोहे महफ़ूज) है।(39)

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अल्लाह नबी को केवल क़ुरान पर चलने का हुक्म करता है  

اِتَّبِعۡ مَاۤ اُوۡحِىَ اِلَيۡكَ مِنۡ رَّبِّكَ‌‌ۚ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ‌ۚ وَاَعۡرِضۡ عَنِ الۡمُشۡرِكِيۡنَ‏ (۱۰۶)  وَلَوۡ شَآءَ اللّٰهُ مَاۤ اَشۡرَكُوۡا ‌ؕ وَمَا جَعَلۡنٰكَ عَلَيۡهِمۡ حَفِيۡظًا‌ ۚ وَمَاۤ اَنۡتَ عَلَيۡهِمۡ بِوَكِيۡلٍ‏ ﴿۱۰۷﴾۔

[Q-06:106-107]

            [हे नबी] आप उसपर चलें, जो आपपर आपके रब की ओर से वह़्यी (प्रकाशना) की जा रही है। उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुश्रिकों की बातों पर ध्यान न दें।(106) और यदि अल्लाह चाहता, तो वो लोग अल्लाह के अतिरिक्त किसी को साझी न बनाते और हमने आपको उनपर निरीक्षक नहीं बनाया है और न ही आप उनपर अधिकारी हैं।(107)

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पैगंबर कुरान और उसकी शिक्षाओं का वर्णन करते हैं।

الٓرٰ‌ ࣞ  كِتٰبٌ اُحۡكِمَتۡ اٰيٰـتُهٗ ثُمَّ فُصِّلَتۡ مِنۡ لَّدُنۡ حَكِيۡمٍ خَبِيۡرٍۙ‏ (۱)  اَلَّا تَعۡبُدُوۡۤا اِلَّا اللّٰهَ‌ ؕ اِنَّنِىۡ لَـكُمۡ مِّنۡهُ نَذِيۡرٌ وَّبَشِيۡرٌ ۙ‏ (۲)  وَّاَنِ اسۡتَغۡفِرُوۡا رَبَّكُمۡ ثُمَّ تُوۡبُوۡۤا اِلَيۡهِ يُمَتِّعۡكُمۡ مَّتَاعًا حَسَنًا اِلٰٓى اَجَلٍ مُّسَمًّى وَ يُؤۡتِ كُلَّ ذِىۡ فَضۡلٍ فَضۡلَهٗ ‌ؕ وَاِنۡ تَوَلَّوۡا فَاِنِّىۡۤ اَخَافُ عَلَيۡكُمۡ عَذَابَ يَوۡمٍ كَبِيۡرٍ‏ ﴿۳﴾۔

[Q-11:1-3]

             अलिफ, लाम, रा। ये पुस्तक है, जिसकी आयतें सुदृढ़ की गयीं, फिर सविस्तार वर्णित की गयी हैं, उसकी ओर से, जो तत्वज्ञ, सर्वसूचित है।(1) कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो। वास्तव में, मैं उसकी ओर से तुम्हें सचेत करने वाला तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ।(2) और ये है कि अपने पालनहार से क्षमा याचना करो, फिर उसी की ओर ध्यानमग्न हो जाओ। वह तुम्हें एक निर्धारित अवधि तक अच्छा लाभ पहुँचाएगा और प्रत्येक श्रेष्ठ को उसकी श्रेष्ठता प्रदान करेगा और यदि तुम मुँह फेरोगे, तो मैं तुमपर एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ।(3)


قَدۡ جَآءَكُمۡ بَصَآٮِٕرُ مِنۡ رَّبِّكُمۡ  ۚ  فَمَنۡ اَبۡصَرَ فَلِنَفۡسِهٖ‌ ۚ وَمَنۡ عَمِىَ فَعَلَيۡهَا‌ ؕ وَمَاۤ اَنَا عَلَيۡكُمۡ بِحَفِيۡظٍ‏ ﴿۱۰۴﴾۔

[Q-06:104]

               [हे नबी कह दो कि] तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ से निशानियाँ आ चुकी हैं। तो जिसने समझ-बूझ से काम लिया, उसका लाभ उसी के लिए है और जो अन्धा हो गया, तो उसकी हानि उसी पर है और मैं तुमपर संरक्षक नहीं हूँ।(104)


وَاَنۡ اَتۡلُوَا الۡقُرۡاٰنَ‌ۚ فَمَنِ اهۡتَدٰى فَاِنَّمَا يَهۡتَدِىۡ لِنَفۡسِهٖ‌ۚ وَمَنۡ ضَلَّ فَقُلۡ اِنَّمَاۤ اَنَا مِنَ الۡمُنۡذِرِيۡنَ‏ ﴿۹۲﴾۔

[Q-27:92]

            तथा क़ुर्आन पढ़ते रहो, तो जिस इंसान ने [क़ुरान पढ़कर] सुपथ अपनाया, तो उसने अपने ही लाभ के लिए सुपथ अपनाया। और जो कुपथ हो जाये, तो आप कह दें कि वास्तव में, मैं तो बस सावधान करने वालों में से हूँ।(1)


وَمَاۤ اَرۡسَلۡنَا مِنۡ رَّسُوۡلٍ اِلَّا بِلِسَانِ قَوۡمِهٖ لِيُبَيِّنَ لَهُمۡ‌ؕ فَيُضِلُّ اللّٰهُ مَنۡ يَّشَآءُ وَيَهۡدِىۡ مَنۡ يَّشَآءُ‌ ؕ وَهُوَ الۡعَزِيۡزُ الۡحَكِيۡمُ‏ ﴿۴﴾۔

[Q-14:04]

           और हमने प्रत्येक  रसूल को उसकी जाति की भाषा ही में भेजा, ताकि वह उनके लिए बात [सरलता से] समझा सके। फिर अल्लाह जिसे चाहता है, कुपथ करता है और जिसे चाहता है, सुपथ दर्शा देता है और वही प्रभुत्वशाली और ह़िक्मत वाला है।(4)


قَالَتۡ لَهُمۡ رُسُلُهُمۡ اِنۡ نَّحۡنُ اِلَّا بَشَرٌ مِّثۡلُكُمۡ وَلٰـكِنَّ اللّٰهَ يَمُنُّ عَلٰى مَنۡ يَّشَآءُ مِنۡ عِبَادِهٖ ؕ وَمَا كَانَ لَنَاۤ اَنۡ نَّاۡتِيَكُمۡ بِسُلۡطٰنٍ اِلَّا بِاِذۡنِ اللّٰهِ ؕ وَعَلَى اللّٰهِ فَلۡيَتَوَكَّلِ الۡمُؤۡمِنُوۡنَ‏ ﴿۱۱﴾۔

[Q-14:11]

          उनसे उनके रसूलों ने कहाः हम तुम्हारे जैसे मानव पुरुष ही हैं, परन्तु अल्लाह अपने भक्तों में से जिसपर चाहे, [नब्वत का] उपकार करता है और हमारे बस में नहीं कि अल्लाह की अनुमति के बिना कोई प्रमाण [मोज़्ज़ा/चमत्कार] ले आयें और अल्लाह ही पर ईमान वालों को भरोसा करना चाहिए।(11)

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नब्वत केवल मर्दों को प्राप्त हुई।

وَمَاۤ اَرۡسَلۡنَا قَبۡلَكَ اِلَّا رِجَالًا نُّوۡحِىۡۤ اِلَيۡهِمۡ‌ فَسۡـــَٔلُوۡۤا اَهۡلَ الذِّكۡرِ اِنۡ كُنۡتُمۡ لَا تَعۡلَمُوۡنَ‏ (۷)  وَمَا جَعَلۡنٰهُمۡ جَسَدًا لَّا يَاۡكُلُوۡنَ الطَّعَامَ وَمَا كَانُوۡا خٰلِدِيۡنَ‏ ﴿۸﴾۔

[Q-21:7-8]

          और [हे नबी]! हमने आपसे पहले मनुष्य पुरुषों को ही रसूल बनाकर भेजा, जिनकी ओर वह़्यी भेजते थे। फिर तुम अहले किताब  से पूछ लो, यदि तुम (स्वयं) नहीं  जानते हो।(7) तथा हमने उनके ऐसे शरीर भी नहीं बनाये थे जो कि भोजन न करते हों और न वे हमेशा रहने वाले (अमर) थे।(8)


وَمَاۤ اَرۡسَلۡنَا مِنۡ قَبۡلِكَ اِلَّا رِجَالًا نُّوۡحِىۡۤ اِلَيۡهِمۡ‌ فَسۡـــَٔلُوۡۤا اَهۡلَ الذِّكۡرِ اِنۡ كُنۡتُمۡ لَا تَعۡلَمُوۡنَۙ‏ (۴۳)  بِالۡبَيِّنٰتِ وَالزُّبُرِ‌ؕ وَاَنۡزَلۡنَاۤ اِلَيۡكَ الذِّكۡرَ لِتُبَيِّنَ لِلنَّاسِ مَا نُزِّلَ اِلَيۡهِمۡ وَلَعَلَّهُمۡ يَتَفَكَّرُوۡنَ‏ ﴿۴۴﴾۔ 

[Q-16:43-44]

          और (हे नबी!) हमने आपसे पहले जो भी रसूल भेजे, वे सभी मानव-पुरुष थे। जिनकी ओर हम वह़्यी (प्रकाशना) करते रहे। तो तुम ज्ञानियों से (किताब वालों से) पूछ लो? यदि [स्वंय] नहीं जानते। (43) [और उन रसूलों को] प्रत्यक्ष (खुले) प्रमाणों तथा पुस्तकों के साथ और आपकी ओर ये शिक्षा (क़ुर्आन) अवतरित की, ताकि आप उसे सर्वमानव के लिए उजागर कर दें, जो कुछ उनकी ओर उतारा (नाज़िल किया) गया है, ताकि वे सोच-विचार करें।(44)


وَمَاۤ اَرۡسَلۡنَا مِنۡ قَبۡلِكَ اِلَّا رِجَالًا نُّوۡحِىۡۤ اِلَيۡهِمۡ مِّنۡ اَهۡلِ الۡقُرٰى‌ؕ ﴿۱۰۹﴾۔

[Q-12:109]

       और हमने आपसे पहले मानव  पुरुषों ही को नबी बनाकर भेजा, जिनकी ओर प्रकाशना (वह्यी) भेजते रहे। (109)


قَالَتۡ لَهُمۡ رُسُلُهُمۡ اِنۡ نَّحۡنُ اِلَّا بَشَرٌ مِّثۡلُكُمۡ وَلٰـكِنَّ اللّٰهَ يَمُنُّ عَلٰى مَنۡ يَّشَآءُ مِنۡ عِبَادِهٖ‌ؕ وَمَا كَانَ لَنَاۤ اَنۡ نَّاۡتِيَكُمۡ بِسُلۡطٰنٍ اِلَّا بِاِذۡنِ اللّٰهِ‌ؕ وَعَلَى اللّٰهِ فَلۡيَتَوَكَّلِ الۡمُؤۡمِنُوۡنَ‏ ﴿۱۱﴾۔

[Q-14:11]

          उनसे उनके रसूलों ने कहाः हम तुम्हारे जैसे मानव पुरुष ही हैं, परन्तु अल्लाह अपने भक्तों में से जिसपर चाहे, [नब्वत का] उपकार करता है और हमारे बस में नहीं कि अल्लाह की अनुमति के बिना कोई प्रमाण [मोज़्ज़ा/चमत्कार] ले आयें और अल्लाह ही पर ईमान वालों को भरोसा करना चाहिए।(11)

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सभी नबियों का उद्देश्य! एक ईश्वर और उसके आदेश पहुंचाना था।  

وَمَاۤ اَرۡسَلۡنَا مِنۡ قَبۡلِكَ مِنۡ رَّسُوۡلٍ اِلَّا نُوۡحِىۡۤ اِلَيۡهِ اَنَّهٗ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّاۤ اَنَا فَاعۡبُدُوۡنِ‏ ﴿۲۵﴾۔

[Q-21:25]

            और हमने आप ﷺ से पहले जो रसूल भेजे, उनकी ओर यही वह़्यी (प्रकाशना) करते रहे कि मेरे सिवा कोई पूज्य नहीं है। अतः मेरी ही इबादत (वंदना) करो।(25)


اِنَّاۤ اَرۡسَلۡنٰكَ بِالۡحَـقِّ بَشِيۡرًا وَّنَذِيۡرًاؕ وَاِنۡ مِّنۡ اُمَّةٍ اِلَّا خَلَا فِيۡهَا نَذِيۡرٌ‏ (۲۴)  وَاِنۡ يُّكَذِّبُوۡكَ فَقَدۡ كَذَّبَ الَّذِيۡنَ مِنۡ قَبۡلِهِمۡ‌ۚ جَآءَتۡهُمۡ رُسُلُهُمۡ بِالۡبَيِّنٰتِ وَبِالزُّبُرِ وَبِالۡكِتٰبِ الۡمُنِيۡرِ‏ ﴿۲۵﴾۔

[Q-35:24-25]

            वास्तव में, हमने आपको सत्य के साथ शुभ सूचक तथा सचेतकर्ता बनाकर भेजा है और कोई ऐसा समुदाय (उम्मत) नहीं, जिसमें कोई सचेतकर्ता न आया हो।(24) और यदि ये आपको झुठलायें, तो इनसे पूर्व के लोगों ने भी झुठलाया है, जिनके पास हमारे रसूल खुले प्रमाण तथा ग्रंथ और प्रकाशित पुस्तकें लाये।(25)


لَـقَدۡ اَرۡسَلۡنَا رُسُلَنَا بِالۡبَيِّنٰتِ وَاَنۡزَلۡنَا مَعَهُمُ الۡكِتٰبَ وَالۡمِيۡزَانَ لِيَقُوۡمَ النَّاسُ بِالۡقِسۡطِ‌ۚ ﴿۲۵﴾۔

[Q-57:25]

            निःसंदेह, हमने भेजा है अपने रसूलों को खुले प्रमाणों के साथ तथा उतारी है उनके साथ पुस्तक तथा तुला (न्याय का नियम), ताकि लोग न्याय पर स्थित रहें। (25)


 

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