अल्लाह और रसूल ﷺ का अनुसरण।

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رَّبِّ اَعُوۡذُ بِکَ مِنۡ ھَمَزٰتِ الشَّیٰطِیۡنِ ۙ وَ اَعُوۡذُ بِکَ رَبِّ اَنۡ یَّحۡضُرُوۡن ؕ۔

بِسۡمِ اللّٰهِ الرَّحۡمٰنِ الرَّحِيۡمِۙ۔

Contents
  1. अल्लाह के आदेश से रसूलअल्लाह ने एकेश्वर मानने वालों से कहा।  
  2. रसूल ﷺ का जीवन कुरान के अनुसार सबसे अच्छा उदाहरण।
  3. अल्लाह त्आला मोहम्मद ﷺ  के दूतत्व की गवाही देता है।  
  4. अल्लाह और उसके रसूल का अनुसरण करो। 
  5. रसूल ﷺ को क़ुरान का पालन करने का आदेश।
  6.  मानव जाति को क़ुरान और रसूल की आज्ञाकारिता का आदेश।
  7. अल्लाह उम्मतों और पेगम्बरों दोनों से! पेग़ामे तोहीद के प्रति सवाल करेगा।
  8. हमारी न्याय प्रणाली! अल्लाह और रसूल के बताए नियमानुसार होनी चाहिये।
  9. अल्लाह और रसूल के आदेश! हर ईमान वाले मर्द और औरत पर अनिवार्य।
  10. रसूलअल्लाह [मोहम्मद ﷺ] सभी नबियों में प्रमुख।
  11. जो लोग अल्लाह और रसूल की आज्ञा का पालन करते हैं।
  12. जो लोग अल्लाह और रसूल के मुखालिफत करते हैं।
  13. आप ﷺ और तमाम नबियों को एकसमान आदेश।
  14. क़ुरान ही इस्लाम का सही रास्ता।
  15. अल्लाह नबी को अपना पक्ष रखने का आदेश देता है।

अल्लाह के आदेश से रसूलअल्लाह ने एकेश्वर मानने वालों से कहा।  

الٓرٰ‌ ࣞ  كِتٰبٌ اُحۡكِمَتۡ اٰيٰـتُهٗ ثُمَّ فُصِّلَتۡ مِنۡ لَّدُنۡ حَكِيۡمٍ خَبِيۡرٍۙ‏ (۱)  اَلَّا تَعۡبُدُوۡۤا اِلَّا اللّٰهَ‌ ؕ اِنَّنِىۡ لَـكُمۡ مِّنۡهُ نَذِيۡرٌ وَّبَشِيۡرٌ ۙ‏ (۲)  وَّاَنِ اسۡتَغۡفِرُوۡا رَبَّكُمۡ ثُمَّ تُوۡبُوۡۤا اِلَيۡهِ يُمَتِّعۡكُمۡ مَّتَاعًا حَسَنًا اِلٰٓى اَجَلٍ مُّسَمًّى وَ يُؤۡتِ كُلَّ ذِىۡ فَضۡلٍ فَضۡلَهٗ ‌ؕ وَاِنۡ تَوَلَّوۡا فَاِنِّىۡۤ اَخَافُ عَلَيۡكُمۡ عَذَابَ يَوۡمٍ كَبِيۡرٍ‏ ﴿۳﴾۔

[Q-11:1-3]

             अलिफ, लाम, रा। ये पुस्तक है, जिसकी आयतें सुदृढ़ की गयीं, फिर सविस्तार वर्णित की गयी हैं, उस रब की  ओर से, जो तत्वज्ञ, सर्वसूचित है।(1) कि अल्लाह के सिवा किसी की इबादत (वंदना) न करो। वास्तव में, मैं (रसूल ﷺ) अल्लाह की ओर से तुम्हें सचेत करने वाला तथा शुभ सूचना देने वाला हूँ।(2) और ये है कि अपने पालनहार से क्षमा याचना करो, फिर उसी की ओर ध्यानमग्न हो जाओ। वह तुम्हें एक निर्धारित अवधि तक अच्छा लाभ पहुँचाएगा और प्रत्येक श्रेष्ठ को उसकी श्रेष्ठता प्रदान करेगा और यदि तुम मुँह फेरोगे, तो मैं तुमपर एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ।(3)


قُلۡ اِنَّمَاۤ اُمِرۡتُ اَنۡ اَعۡبُدَ اللّٰهَ وَلَاۤ اُشۡرِكَ بِهٖؕ اِلَيۡهِ اَدۡعُوۡا وَاِلَيۡهِ مَاٰبِ‏ ﴿۳۶﴾۔

[Q-13:36]

              (हे नबी!) आप कह दें कि मुझे आदेश दिया गया है कि अल्लाह ही की ईबादत (वंदना) करूँ और उसका साझी न बनाऊँ। मैं उसी की ओर बुलाता हूँ और उसी की ओर मुझे जाना है।(36)


 يٰۤـاَيُّهَا الَّذِيۡنَ اٰمَنُوا اتَّقُوا اللّٰهَ وَقُوۡلُوۡا قَوۡلًا سَدِيۡدًا ۙ‏ ﴿۷۰﴾  يُّصۡلِحۡ لَـكُمۡ اَعۡمَالَـكُمۡ وَيَغۡفِرۡ لَـكُمۡ ذُنُوۡبَكُمۡ ؕ وَمَنۡ يُّطِعِ اللّٰهَ وَرَسُوۡلَهٗ فَقَدۡ فَازَ فَوۡزًا عَظِيۡمًا‏ ﴿۷۱﴾۔

[Q-33:70-71]

              हे ईमान वालो! अल्लाह से डरो तथा सही और सीधी बात बोलो।(70) वह तुम्हारे लिए तुम्हारे कर्मों को सुधार देगा, तथा तुम्हारे पापों को क्षमा कर देगा, और जो अनुपालन करेगा अल्लाह तथा उसके रसूल का, तो उसने बड़ी सफलता प्राप्त कर ली।(71)

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रसूल ﷺ का जीवन कुरान के अनुसार सबसे अच्छा उदाहरण।

لَقَدۡ كَانَ لَكُمۡ فِىۡ رَسُوۡلِ اللّٰهِ اُسۡوَةٌ حَسَنَةٌ لِّمَنۡ كَانَ يَرۡجُوا اللّٰهَ وَالۡيَوۡمَ الۡاٰخِرَ وَذَكَرَ اللّٰهَ كَثِيۡرًا ؕ‏ ﴿۲۱﴾۔

[Q-33:21]

            तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में उत्तम  आदर्श है, उसके लिए, जो आशा रखता हो अल्लाह और अन्तिम दिन (प्रलय) की! तथा अल्लाह को अत्यधिक याद करता हो।(21)

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अल्लाह त्आला मोहम्मद ﷺ  के दूतत्व की गवाही देता है।  

 مَاۤ اَصَابَكَ مِنۡ حَسَنَةٍ فَمِنَ اللّٰهِ‌ؗ وَمَاۤ اَصَابَكَ مِنۡ سَيِّئَةٍ فَمِنۡ نَّـفۡسِكَ‌ ؕ وَاَرۡسَلۡنٰكَ لِلنَّاسِ رَسُوۡلًا‌ ؕ وَكَفٰى بِاللّٰهِ شَهِيۡدًا‏ ﴿۷۹﴾ مَنۡ يُّطِعِ الرَّسُوۡلَ فَقَدۡ اَطَاعَ اللّٰهَ ‌ۚ وَمَنۡ تَوَلّٰى فَمَاۤ اَرۡسَلۡنٰكَ عَلَيۡهِمۡ حَفِيۡظًا ؕ‏ ﴿۸۰﴾۔

[Q-04:79-80]

              (वास्तविक्ता तो ये है कि) तुम्हें जो सुख पहुँचता है, वह अल्लाह की ओर से होता है तथा जो हानि पहुँचती है, वह स्वयं (तुम्हारे कुकर्मों के) कारण होती है और हमने आपको सब मानव का रसूल  (संदेशवाहक) बनाकर भेजा  है और (आपके रसूल होने के लिए) अल्लाह का साक्ष्य बहुत है।(79) जिसने रसूल की आज्ञा का अनुपालन किया, (वास्तव में) उसने अल्लाह की आज्ञा का पालन किया तथा जिसने मुँह फेर लिया, तो (हे नबी!) हमने आपको उनका प्रहरी (रक्षक) बनाकर नहीं भेजा  है। (80)

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अल्लाह और उसके रसूल का अनुसरण करो। 

وَاَطِيۡعُوا اللّٰهَ وَاَطِيۡعُوا الرَّسُوۡلَ وَاحۡذَرُوۡا‌ ۚ فَاِنۡ تَوَلَّيۡتُمۡ فَاعۡلَمُوۡۤا اَنَّمَا عَلٰى رَسُوۡلِنَا الۡبَلٰغُ الۡمُبِيۡنُ‏ ﴿۹۲﴾۔

[Q-05:92]

             तथा अल्लाह के आज्ञाकारी रहो, उसके रसूल के आज्ञाकारी रहो तथा (उनकी अवज्ञा से) सावधान रहो। यदि तुम विमुख हुए, तो जान लो कि हमारे रसूल पर केवल खुला उपदेश पहुँचा देना है।(92)

قُلۡ اَطِيۡعُوا اللّٰهَ وَاَطِيۡعُوا الرَّسُوۡلَ‌ۚ فَاِنۡ تَوَلَّوۡا فَاِنَّمَا عَلَيۡهِ مَا حُمِّلَ وَعَلَيۡكُمۡ مَّا حُمِّلۡتُمۡ‌ؕ وَاِنۡ تُطِيۡعُوۡهُ تَهۡتَدُوۡا‌ؕ وَمَا عَلَى الرَّسُوۡلِ اِلَّا الۡبَلٰغُ الۡمُبِيۡنُ‏ ﴿۵۴﴾۔

[Q-24:54]

          (हे नबी!) आप कह दें कि अल्लाह और रसूल की आज्ञा का पालन करो।  और यदि वे विमुख हों (हक़/सत्य का रास्ता छोड़ दें), तो आपका कर्तव्य केवल वही है, जिसका भार आप पर रखा गया है और तुम्हारा वह है, जिसका भार तुमपर रखा गया है और रसूल का दायित्व केवल खुला आदेश (क़ुरान) पहुँचा देना है।(54)


रसूल ﷺ को क़ुरान का पालन करने का आदेश।

يٰۤـاَيُّهَا النَّبِىُّ اتَّقِ اللّٰهَ وَلَا تُطِعِ الۡكٰفِرِيۡنَ وَالۡمُنٰفِقِيۡنَ‌ ؕ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ عَلِيۡمًا حَكِيۡمًا ۙ‏ ﴿۱﴾  وَّاتَّبِعۡ مَا يُوۡحٰٓى اِلَيۡكَ مِنۡ رَّبِّكَ‌ ؕ اِنَّ اللّٰهَ كَانَ بِمَا تَعۡمَلُوۡنَ خَبِيۡرًا ۙ‏ ﴿۲﴾۔

[Q-33:1-2]

             हे नबी! अल्लाह से डरो और काफ़िरों और मुनाफ़िक़ों की आज्ञा का पालन न करो। वास्तव में, अल्लाह ह़िक्मत वाला, सब कुछ जानने वाला है।(1) तथा आपके रब की ओर से आपकी ओर जो वह़्यी (प्रकाशना) की जा रही है उस [क़ुरान] का पालन करो।2.


قُلْ لَّاۤ اَقُوۡلُ لَـكُمۡ عِنۡدِىۡ خَزَآٮِٕنُ اللّٰهِ وَلَاۤ اَعۡلَمُ الۡغَيۡبَ وَلَاۤ اَقُوۡلُ لَـكُمۡ اِنِّىۡ مَلَكٌ ۚ اِنۡ اَتَّبِعُ اِلَّا مَا يُوۡحٰٓى اِلَىَّ ؕ  قُلۡ هَلۡ يَسۡتَوِى الۡاَعۡمٰى وَالۡبَصِيۡرُ ؕ  اَفَلَا تَتَفَكَّرُوۡنَ ﴿۵۰﴾۔

[Q-06:50]

             (हे नबी!) आप कह दें कि मेरे पास अल्लाह का कोष (खज़ाना) नहीं है, मैं परोक्ष (ग़ैब) का ज्ञान रखता हूँ और मैं ये कहता हूँ कि मैं कोई फ़रिश्ता हूँ। मैं तो केवल उसीपर चल रहा हूँ, जो मेरी ओर वह़्यी (प्रकाशना) की जा रही है। आप ﷺ कहें कि क्या अंधा तथा आँख वाला बराबर हो जायेंगे? क्या तुम सोच विचार नहीं करते? 50.


اِتَّبِعۡ مَاۤ اُوۡحِىَ اِلَيۡكَ مِنۡ رَّبِّكَ‌‌ۚ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ‌ۚ وَاَعۡرِضۡ عَنِ الۡمُشۡرِكِيۡنَ‏ ﴿۱۰۶﴾  وَلَوۡ شَآءَ اللّٰهُ مَاۤ اَشۡرَكُوۡا ‌ؕ وَمَا جَعَلۡنٰكَ عَلَيۡهِمۡ حَفِيۡظًا‌ ۚ وَمَاۤ اَنۡتَ عَلَيۡهِمۡ بِوَكِيۡلٍ‏ ﴿۱۰۷﴾۔

[Q-06:106-107]

               [हे नबी] आप उसपर चलें, जो आपपर आपके रब की ओर से वह़्यी (प्रकाशना) की जा रही है। उसके सिवा कोई सत्य पूज्य नहीं है और मुश्रिकों की बातों पर ध्यान न दें।(106) और यदि अल्लाह चाहता, तो वो लोग अल्लाह के अतिरिक्त किसी को साझी न बनाते और हमने आपको उनपर निरीक्षक नहीं बनाया है और ही आप उनपर अधिकारी हैं।(107)

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 मानव जाति को क़ुरान और रसूल की आज्ञाकारिता का आदेश।

يٰۤـاَيُّهَا النَّاسُ قَدۡ جَآءَكُمُ الرَّسُوۡلُ بِالۡحَـقِّ مِنۡ رَّبِّكُمۡ فَاٰمِنُوۡا خَيۡرًا لَّـكُمۡ ؕ ﴿۱۷۰﴾۔

[Q-04:170]

              हे लोगो! तुम्हारे पास तुम्हारे रब की ओर से रसूल सत्य लेकर गये हैं। अतः, उनपर ईमान लाओ, यही तुम्हारे लिए अच्छा है।(170)


قَدۡ جَآءَكُمۡ بَصَآٮِٕرُ مِنۡ رَّبِّكُمۡ  ۚ  فَمَنۡ اَبۡصَرَ فَلِنَفۡسِهٖ‌ ۚ وَمَنۡ عَمِىَ فَعَلَيۡهَا‌ ؕ وَمَاۤ اَنَا عَلَيۡكُمۡ بِحَفِيۡظٍ‏ ﴿۱۰۴﴾۔

[Q-06:104)

               [हे नबी कह दो कि] तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ से निशानियाँ चुकी हैं। तो जिसने समझबूझ से काम लिया, उसका लाभ उसी के लिए है और जो अन्धा हो गया, तो उसकी हानि उसी पर है और मैं तुमपर संरक्षक नहीं हूँ।(104)


 كَمَآ اَرۡسَلۡنَا فِيۡکُمۡ رَسُوۡلًا مِّنۡکُمۡ يَتۡلُوۡا عَلَيۡكُمۡ اٰيٰتِنَا وَيُزَكِّيۡکُمۡ وَيُعَلِّمُکُمُ الۡكِتٰبَ وَالۡحِکۡمَةَ وَيُعَلِّمُكُمۡ مَّا لَمۡ تَكُوۡنُوۡا تَعۡلَمُوۡنَ ؕ‌ۛ‏ ﴿۱۵۱﴾۔

[Q-02:151].

                जिस प्रकार हमने तुम्हारे लिए तुम्हीं में से एक रसूल भेजा, जो तुम्हें हमारी आयतें सुनाता तथा तुम्हें शुध्द आज्ञाकारी बनाता है और तुम्हें पुस्तक (कुर्आन) तथा ह़िक्मत (तदबीरी ज्ञान) सिखाता है तथा तुम्हें वो बातें सिखाता है, जो तुम नहीं जानते थे।151.


   يٰۤاَيُّهَا الَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡۤا اٰمِنُوۡا بِاللّٰهِ وَرَسُوۡلِهٖ وَالۡكِتٰبِ الَّذِىۡ نَزَّلَ عَلٰى رَسُوۡلِهٖ وَالۡكِتٰبِ الَّذِىۡۤ اَنۡزَلَ مِنۡ قَبۡلُ‌ؕ وَمَنۡ يَّكۡفُرۡ بِاللّٰهِ وَمَلٰٓٮِٕكَتِهٖ وَكُتُبِهٖ وَرُسُلِهٖ وَالۡيَوۡمِ الۡاٰخِرِ فَقَدۡ ضَلَّ ضَلٰلًاۢ بَعِيۡدًا‏ ﴿۱۳۶﴾۔

[Q-04:136].

              हे ईमान वालो! ईमान लाओ। अल्लाह, और उसके रसूल और उस पुस्तक (क़ुर्आन) पर, जो उसने अपने रसूल पर उतारी है तथा उन पुस्तकों पर, जो इससे पहले उतारी हैं, जो कोई अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी पुस्तकों और क़यामत (प्रलय) को अस्वीकार करेगा, वह गुमराही (कुपथ) में बहुत दूर जा पड़ेगा।[136]


اِتَّبِعُوۡا مَاۤ اُنۡزِلَ اِلَيۡكُمۡ مِّنۡ رَّبِّكُمۡ وَلَا تَتَّبِعُوۡا مِنۡ دُوۡنِهٖۤ اَوۡلِيَآءَ‌ ؕ قَلِيۡلًا مَّا تَذَكَّرُوۡنَ ﴿۳﴾۔

[Q-07:03]

            (हे लोगो!) जो तुम्हारे पालनहार की ओर से तुमपर उतारा गया है, उसपर चलो और उसके सिवा दूसरे औलिया (सहायकों) के पीछे न चलो। तुम बहुत थोड़ी शिक्षा लेते हो।(3)


وَاَطِيۡعُوا اللّٰهَ وَالرَّسُوۡلَ لَعَلَّكُمۡ تُرۡحَمُوۡنَ‌ۚ‏ ﴿۱۳۲﴾۔

[Q-03:132].

               तथा अल्लाह और रसूल के आज्ञाकारी रहो, ताकि तुमपर दया की जाये।(132)


يٰبَنِىۡۤ اٰدَمَ اِمَّا يَاۡتِيَنَّكُمۡ رُسُلٌ مِّنۡكُمۡ يَقُصُّوۡنَ عَلَيۡكُمۡ اٰيٰتِىۡ‌ۙ فَمَنِ اتَّقٰى وَاَصۡلَحَ فَلَا خَوۡفٌ عَلَيۡهِمۡ وَلَا هُمۡ يَحۡزَنُوۡنَ‏ ﴿۳۵﴾۔

[Q-07:35]

           हे आदम के पुत्रो! जब तुम्हारे पास तुम्हीं में से रसूल जायें जो तुम्हें मेरी आयतें सुना रहे हों, तो जो डरेगा और अपना सुधार कर लेगा, उसके लिए कोई डर नहीं होगा और न वे उदासीन होंगे।


يٰۤـاَيُّهَا الَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡۤا اَطِيۡعُوا اللّٰهَ وَرَسُوۡلَهٗ وَلَا تَوَلَّوۡا عَنۡهُ وَاَنۡـتُمۡ تَسۡمَعُوۡنَ‌ ۖ‌ ۚ‏ ﴿۲۰﴾۔  وَلَا تَكُوۡنُوۡا كَالَّذِيۡنَ قَالُوۡا سَمِعۡنَا وَهُمۡ لَا يَسۡمَعُوۡنَ‌‏ ﴿۲۱﴾۔ اِنَّ شَرَّ الدَّوَآبِّ عِنۡدَ اللّٰهِ الصُّمُّ الۡبُكۡمُ الَّذِيۡنَ لَا يَعۡقِلُوۡنَ‏ ﴿۲۲﴾۔

[Q-8:20-22]

              हे ईमान वालो! अल्लाह के आज्ञाकारी रहो तथा उसके रसूल के और सुनकर उससे मुँह न फेरो।(20) तथा उनके समान न हो जाओ, जिन्होंने कहा कि हमने सुन लिया, जबकि वास्तव में वे सुनते नहीं।(21) वास्तव में, अल्लाह के यहाँ सब जीवों में बुरे यही बहरे-गूँगे (मानव) हैं, जो कुछ समझते नहीं।(22)


وَيَقُوۡلُوۡنَ اٰمَنَّا بِاللّٰهِ وَبِالرَّسُوۡلِ وَاَطَعۡنَا ثُمَّ يَتَوَلّٰى فَرِيۡقٌ مِّنۡهُمۡ مِّنۡۢ بَعۡدِ ذٰلِكَ‌ؕ وَمَاۤ اُولٰٓٮِٕكَ بِالۡمُؤۡمِنِيۡنَ‏ ﴿۴۷﴾۔

[Q-24:47]

              और  वे कहते हैं कि हम अल्लाह तथा रसूल पर ईमान लाये और हम आज्ञाकारी हो गये, फिर इसके पश्चात् उनमें से एक गिरोह मुँह फेर लेता है । वास्तव में, वे ईमान वाले हैं ही नहीं।47.


اِنَّمَا كَانَ قَوۡلَ الۡمُؤۡمِنِيۡنَ اِذَا دُعُوۡۤا اِلَى اللّٰهِ وَرَسُوۡلِهٖ لِيَحۡكُمَ بَيۡنَهُمۡ اَنۡ يَّقُوۡلُوۡا سَمِعۡنَا وَاَطَعۡنَا‌ؕ وَاُولٰٓٮِٕكَ هُمُ الۡمُفۡلِحُوۡنَ‏ ﴿۵۱﴾  وَمَنۡ يُّطِعِ اللّٰهَ وَرَسُوۡلَهٗ وَيَخۡشَ اللّٰهَ وَيَتَّقۡهِ فَاُولٰٓٮِٕكَ هُمُ الۡفَآٮِٕزُوۡنَ‏ ﴿۵۲﴾۔

[Q-24:51-52]

            ईमान वालों का कथन तो ये है कि जब अल्लाह और उसके रसूल की ओर बुलाये जायें, ताकि आप उनके बीच निर्णँय कर दें, तो कहें कि हमने सुन लिया तथा मान लिया और वही सफल होने वाले हैं।51. तथा जो अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करें, अल्लाह का भय रखें और उसकी (यातना से) डरें, तो वही सफल होने वाले हैं।52.


وَاَقِيۡمُوا الصَّلٰوةَ وَ اٰ تُوا الزَّكٰوةَ وَاَطِيۡـعُوا الرَّسُوۡلَ لَعَلَّكُمۡ تُرۡحَمُوۡنَ‏ ﴿۵۶﴾۔

[Q-24:56]

             तथा नमाज़ की स्थापना करो, ज़कात दो तथा रसूल की आज्ञा का पालन करो, ताकि तुमपर दया की जाये।56-

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अल्लाह उम्मतों और पेगम्बरों दोनों से! पेग़ामे तोहीद के प्रति सवाल करेगा।

فَلَنَسۡــَٔــلَنَّ الَّذِيۡنَ اُرۡسِلَ اِلَيۡهِمۡ وَلَـنَسۡـَٔـــلَنَّ الۡمُرۡسَلِيۡنَ ۙ‏ ﴿۶﴾ فَلَنَقُصَّنَّ عَلَيۡهِمۡ بِعِلۡمٍ وَّمَا كُنَّا غَآٮِٕبِيۡنَ‏ ﴿۷﴾۔

[Q-07:6-7]

            तो हम उनसे अवश्य प्रश्न करेंगे, जिनके पास रसूलों को भेजा गया तथा रसूलों से भी अवश्य प्रश्न करेंगे।(6) फिर हम अपने ज्ञान से उनके समक्ष वास्तविक्ता का वर्णन कर देंगे तथा हम अनुपस्थित नहीं थे।(7)


وَاِذۡ اَخَذۡنَا مِنَ النَّبِيّٖنَ مِيۡثَاقَهُمۡ وَمِنۡكَ وَمِنۡ نُّوۡحٍ وَّاِبۡرٰهِيۡمَ وَمُوۡسٰى وَعِيۡسَى ابۡنِ مَرۡيَمَ ࣕ وَاَخَذۡنَا مِنۡهُمۡ مِّيۡثاقًا غَلِيۡظًا ۙ‏ ﴿۷﴾۔لِّيَسۡئَلَ الصّٰدِقِيۡنَ عَنۡ صِدۡقِهِمۡ‌ۚ وَاَعَدَّ لِلۡكٰفِرِيۡنَ عَذَابًا اَ لِيۡمًا‏ ﴿۸﴾۔

[Q-33:7-8]

            तथा (याद करो) जब हमने नबियों से उनका वचन लिया तथा आप से और नूह़ से, और इब्रीम से, और  मूसा से, और मर्यम के पुत्र ईसा से और हमने उनसे दृढ़ (सशक्त) वचन लिया।(7) ताकि [क़यामत के दिन] सच कहने वालों से उनके सच के संबन्ध में प्रश्न करे। तथा काफ़िरों के लिए दुःखदायी यातना (अज़ाब) तैयार किया हुआ है।(8)

           अथार्थ उनपर जो वह्यी (प्रकाशना) की गई वोह उन्होंने सच्चाई के साथ लोगों तक पहुचाइं या नहीं।


اِنَّاۤ اَرۡسَلۡنٰكَ شَاهِدًا وَّمُبَشِّرًا وَّنَذِيۡرًا (۸) لِّـتُؤۡمِنُوۡا بِاللّٰهِ وَ رَسُوۡلِهٖ وَتُعَزِّرُوۡهُ وَتُوَقِّرُوۡهُ ؕ وَتُسَبِّحُوۡهُ بُكۡرَةً وَّاَصِيۡلًا‏ ﴿۹﴾۔

[Q-48:8-9]

             (हे नबी!) हमने आपको गवाह बनाकर तथा शुभ सूचना देने एवं सावधान करने वाला बनाकर भेजा है ।(8) ताकि तुम ईमान लाओ अल्लाह एवं उसके रसूल पर और उनकी सहायता करो तथा आदर करो। और अल्लाह की पवित्रता का वर्णन प्रातः तथा संध्या करते रहो। (9)

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हमारी न्याय प्रणाली! अल्लाह और रसूल के बताए नियमानुसार होनी चाहिये।

يٰۤـاَيُّهَا الَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡۤا اَطِيۡـعُوا اللّٰهَ وَاَطِيۡـعُوا الرَّسُوۡلَ وَاُولِى الۡاَمۡرِ مِنۡكُمۡ‌ۚ فَاِنۡ تَنَازَعۡتُمۡ فِىۡ شَىۡءٍ فَرُدُّوۡهُ اِلَى اللّٰهِ وَالرَّسُوۡلِ اِنۡ كُنۡـتُمۡ تُؤۡمِنُوۡنَ بِاللّٰهِ وَالۡيَـوۡمِ الۡاٰخِرِ‌ ؕ ذٰ لِكَ خَيۡرٌ وَّاَحۡسَنُ تَاۡوِيۡلًا ﴿۵۹﴾۔

[Q-04:59]

               हे ईमान वालो! अल्लाह की आज्ञा का अनुपालन करो और रसूल की आज्ञा का अनुपालन करो तथा अपने शासकों की आज्ञापालन करो। फिर यदि किसी बात में तुम आपस में विवाद (विभेद) कर लो, तो उसे अल्लाह और रसूल [के आदेशों] की ओर फेर दो, यदि तुम अल्लाह तथा अन्तिम दिन (प्रलय) पर ईमान रखते हो। ये तुम्हारे लिए अच्छा है और इसका परिणाम भी अच्छा है।(59)

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अल्लाह और रसूल के आदेश! हर ईमान वाले मर्द और औरत पर अनिवार्य।

وَمَا كَانَ لِمُؤۡمِنٍ وَّلَا مُؤۡمِنَةٍ اِذَا قَضَى اللّٰهُ وَرَسُوۡلُهٗۤ اَمۡرًا اَنۡ يَّكُوۡنَ لَهُمُ الۡخِيَرَةُ مِنۡ اَمۡرِهِمۡ ؕ وَمَنۡ يَّعۡصِ اللّٰهَ وَرَسُوۡلَهٗ فَقَدۡ ضَلَّ ضَلٰلًا مُّبِيۡنًا‏ ﴿۳۶﴾۔

[Q-33:36]

          तथा किसी ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली स्त्री के लिए योग्य नहीं कि जब अल्लाह तथा उसके रसूल किसी बात का निर्णय कर दे, तो अपने विषय में उनके लिए कुछ अधिकार रह जाये। और जो अवज्ञा करेगा अल्लाह एवं उसके रसूल की, तो वह खुले कुपथ (गुमराही) में पड़ गया।(36)


قُلۡ اِنۡ كُنۡتُمۡ تُحِبُّوۡنَ اللّٰهَ فَاتَّبِعُوۡنِىۡ يُحۡبِبۡكُمُ اللّٰهُ وَيَغۡفِرۡ لَـكُمۡ ذُنُوۡبَكُمۡؕ‌ وَاللّٰهُ غَفُوۡرٌ رَّحِيۡمٌ‏ ﴿۳۱﴾  قُلۡ اَطِيۡعُوا اللّٰهَ وَالرَّسُوۡلَ‌‌ ۚ  فَاِنۡ تَوَلَّوۡا فَاِنَّ اللّٰهَ لَا يُحِبُّ الۡكٰفِرِيۡنَ‏ ﴿۳۲﴾۔

[Q-03:31-32]

              (हे नबी!) कह दोः यदि तुम अल्लाह से प्रेम करते हो, तो मेरा अनुसरण करो, अल्लाह तुमसे प्रेम करेगा तथा तुम्हारे पाप क्षमा कर देगा और अल्लाह अति क्षमाशील, दयावान् है।(31)  कह दोः अल्लाह और रसूल की आज्ञा का अनुपालन करो। फिर भी यदि वे विमुख हों, तो निःसंदेह अल्लाह काफ़िरों से प्रेम नहीं करता।(32)

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रसूलअल्लाह [मोहम्मद ﷺ] सभी नबियों में प्रमुख।

اَ لَّذِيۡنَ يَتَّبِعُوۡنَ الرَّسُوۡلَ النَّبِىَّ الۡاُمِّىَّ الَّذِىۡ يَجِدُوۡنَهٗ مَكۡتُوۡبًا عِنۡدَهُمۡ فِى التَّوۡرٰٮةِ وَالۡاِنۡجِيۡلِ ؗ  يَاۡمُرُهُمۡ بِالۡمَعۡرُوۡفِ وَيَنۡهٰٮهُمۡ عَنِ الۡمُنۡكَرِ وَيُحِلُّ لَهُمُ الطَّيِّبٰتِ وَيُحَرِّمُ عَلَيۡهِمُ الۡخَبٰۤٮِٕثَ وَيَضَعُ عَنۡهُمۡ اِصۡرَهُمۡ وَالۡاَغۡلٰلَ الَّتِىۡ كَانَتۡ عَلَيۡهِمۡ‌ ؕ فَالَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡا بِهٖ وَعَزَّرُوۡهُ وَنَصَرُوۡهُ وَ اتَّبَـعُوا النُّوۡرَ الَّذِىۡۤ اُنۡزِلَ مَعَهٗ ۤ‌ ۙ اُولٰۤٮِٕكَ هُمُ الۡمُفۡلِحُوۡنَ‏ ﴿۱۵۷﴾۔

[Q-07:157]

              जो लोग उस रसूल [मोहम्मद ﷺ] का अनुसरण करते हैं! जो नबी उम्मी हैं, जिन (के आगमन) का उल्लेख वे अपने पास तौरात तथा इंजील में पाते हैं; जो सदाचार का आदेश देते हैं। और दुराचार से रोकते हैं। और उनके लिए स्वच्छ चीज़ों को ह़लाल (वैध) तथा मलिन चीज़ों को ह़राम (अवैध) करते हैं। और उनसे उनके बोझ और तोक़ [बंधन] जो उनपर हैं उतारते हैं। अतः जो लोग आपपर ईमान लाये, आपका समर्थन किया, आपकी सहायता की तथा उस प्रकाश  (क़ुर्आन) का अनुसरण किया, जो आपके साथ उतारा गया, तो वही सफल होने वाले हैं।157.


قُلۡ يٰۤاَيُّهَا النَّاسُ اِنِّىۡ رَسُوۡلُ اللّٰهِ اِلَيۡكُمۡ جَمِيۡعَاْ ۨالَّذِىۡ لَهٗ مُلۡكُ السَّمٰوٰتِ وَالۡاَرۡضِ‌ۚ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ يُحۡىٖ وَيُمِيۡتُ ࣕ‌  فَاٰمِنُوۡا بِاللّٰهِ وَرَسُوۡلِهِ النَّبِىِّ الۡاُمِّىِّ الَّذِىۡ يُؤۡمِنُ بِاللّٰهِ وَكَلِمٰتِهٖ وَاتَّبِعُوۡهُ لَعَلَّكُمۡ تَهۡتَدُوۡنَ‏ ﴿۱۵۸﴾۔

[Q-07:158]

               (हे नबी!) आप लोगों से कह दें कि हे मानव जाति के लोगो! मैं तुम सभी की ओर उस अल्लाह का रसूल हूँ, जिसके लिए आकाश तथा धरती (जमीन व आसमान) का राज्य है। उसके अतिरिक्त कोई वंदनीय (पूज्य) नहीं है, वही जीवन देता तथा मारता है। अतः अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके उस उम्मी नबी परजो अल्लाह पर और उसकी सभी (आदि) पुस्तकों पर ईमान रखता हैं। उनका अनुसरण करो, ताकि तुम मार्गदर्शन पा जाओ।(158)

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जो लोग अल्लाह और रसूल की आज्ञा का पालन करते हैं।

وَمَنۡ يُّطِعِ اللّٰهَ وَالرَّسُوۡلَ فَاُولٰٓٮِٕكَ مَعَ الَّذِيۡنَ اَنۡعَمَ اللّٰهُ عَلَيۡهِمۡ مِّنَ النَّبِيّٖنَ وَالصِّدِّيۡقِيۡنَ وَالشُّهَدَآءِ وَالصّٰلِحِيۡنَ‌ ۚ وَحَسُنَ اُولٰٓٮِٕكَ   رَفِيۡقًا ؕ‏ ﴿۶۹﴾  ذٰ لِكَ الۡـفَضۡلُ مِنَ اللّٰهِ‌ ؕ وَكَفٰى بِاللّٰهِ عَلِيۡمًا‏ ﴿۷۰﴾۔

[Q-04:69-70]

              तथा जो अल्लाह और रसूल की आज्ञा का अनुपालन करेंगे, वह (स्वर्ग में), उन लोगों के साथ होंगे, जिनपर अल्लाह ने पुरस्कार किया है, अर्थात नबियों, सत्यवादियों, शहीदों और सदाचारियों के साथ और वे क्या ही अच्छे साथी हैं?(69) ये प्रदान अल्लाह की ओर से है और अल्लाह का ज्ञान बहुत है। (70)


وَالَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡا بِاللّٰهِ وَرُسُلِهٖۤ اُولٰٓٮِٕكَ هُمُ الصِّدِّيۡقُوۡنَ ۚ  وَالشُّهَدَآءُ  عِنۡدَ رَبِّهِمۡؕ لَهُمۡ اَجۡرُهُمۡ وَنُوۡرُهُمۡ‌ؕ وَ الَّذِيۡنَ كَفَرُوۡا وَكَذَّبُوۡا بِاٰيٰتِنَاۤ اُولٰٓٮِٕكَ اَصۡحٰبُ الۡجَحِيۡمِ‏ ﴿۱۹﴾۔

[Q-57:19]

            तथा जो ईमान लाये अल्लाह और उसके रसूलों पर, वही अपने रब के समीप सच्चे तथा गवाह  हैं । उन्हीं के लिए उनका प्रतिफल तथा उनकी दिव्या ज्योति है और जो काफ़िर हो गये और झ़ठलाया हमारी आयतों को, तो वही नारकीय हैं।(19)

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जो लोग अल्लाह और रसूल के मुखालिफत करते हैं।

وَمَنۡ يُّشَاقِقِ الرَّسُوۡلَ مِنۡۢ بَعۡدِ مَا تَبَيَّنَ لَـهُ الۡهُدٰى وَ يَـتَّبِعۡ غَيۡرَ سَبِيۡلِ الۡمُؤۡمِنِيۡنَ نُوَلِّهٖ مَا تَوَلّٰى وَنُصۡلِهٖ جَهَـنَّمَ‌ ؕ وَسَآءَتۡ مَصِيۡرًا‏ ﴿۱۱۵﴾۔  

[Q-04:115]

               तथा जो व्यक्ति अपने ऊपर मार्गदर्शन [क़ुरान] उजागर हो जाने के पश्चात् रसूल का विरोध करे और ईमान वालों की राह के सिवा (दूसरी राह) का अनुसरण करे, तो हम उसे वहीं फेर देंगे, जिधर फिरा है और उसे नरक में झोंक देंगे तथा वह बुरा निवास स्थान है।(115)


اِنَّ الَّذِيۡنَ يُحَآدُّوۡنَ اللّٰهَ وَرَسُوۡلَهٗ كُبِتُوۡا كَمَا كُبِتَ الَّذِيۡنَ مِنۡ قَبۡلِهِمۡ‌ وَقَدۡ اَنۡزَلۡنَاۤ اٰيٰتٍۢ بَيِّنٰتٍ‌ ؕ وَ لِلۡكٰفِرِيۡنَ عَذَابٌ مُّهِيۡنٌ‌ ۚ‏ ﴿۵﴾۔

[Q-58:5]

              वास्तव में, जो विरोध करते हैं अल्लाह तथा उसके रसूल का, वे अपमानित कर दिये जायेंगे, जैसे अपमानित कर दिये गये वोह लोग, जो इनसे पूर्व हुए। और हमने स्पष्ट आयतें नाज़िल की हैं और काफ़िरों के लिए अपमानकारी यातना (ज़िल्लत का अज़ाब) है।(5)

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आप ﷺ और तमाम नबियों को एकसमान आदेश।

 مَا يُقَالُ لَـكَ اِلَّا مَا قَدۡ قِيۡلَ لِلرُّسُلِ مِنۡ قَبۡلِكَ ‌ؕ اِنَّ رَبَّكَ لَذُوۡ مَغۡفِرَةٍ وَّذُوۡ عِقَابٍ اَ لِيۡمٍ‏ ﴿۴۳﴾۔

[Q-41:43]

              आपसे वही कहा जा रहा है, जो आपसे पूर्व रसूलों से कहा गया।  वास्तव में, आपका पालनहार क्षमा करने (तथा) दुःखदायी य़ातना देने वाला है।43-


وَلِلّٰهِ مَا فِى السَّمٰوٰتِ وَمَا فِى الۡاَرۡضِ ‌ؕ وَلَـقَدۡ وَصَّيۡنَا الَّذِيۡنَ اُوۡتُوا الۡكِتٰبَ مِنۡ قَبۡلِكُمۡ وَاِيَّاكُمۡ اَنِ اتَّقُوا اللّٰهَ‌ ؕ وَاِنۡ تَكۡفُرُوۡا فَاِنَّ لِلّٰهِ مَا فِى السَّمٰوٰتِ وَمَا فِى الۡاَرۡضِ‌ؕ وَكَانَ اللّٰهُ غَنِيًّا حَمِيۡدًا‏ ﴿۱۳۱﴾۔

[Q-04:131]

               तथा अल्लाह ही का है, जो आकाशों और धरती में है और तुमसे पूर्व जिन्हे किताब दी गई थी उनको तथा (स्वयं) आप को आदेश दिया है कि अल्लाह से डरते रहो। यदि तुम कुफ्र (अवज्ञा) करोगे, तो निःसंदेह जो कुछ आकाशों तथा धरती में है, वह अल्लाह ही का है तथा अल्लाह निस्पृह प्रशंसित है।(131)

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क़ुरान ही इस्लाम का सही रास्ता।

وَالَّذِىۡ جَآءَ بِالصِّدۡقِ وَصَدَّقَ بِهٖۤ‌ اُولٰٓٮِٕكَ هُمُ الۡمُتَّقُوۡنَ‏ ﴿۳۳﴾  لَهُمۡ مَّا يَشَآءُوۡنَ عِنۡدَ رَبِّهِمۡ‌ ؕ ذٰ لِكَ جَزٰٓؤُ الۡمُحۡسِنِيۡنَ ۚ‏ ﴿۳۴﴾۔

[Q-39:33-34]

            तथा [मुहम्मद ] जो सत्य [क़ुरान] लाये और जिन्होंने [लोगों ने] उसे सच माना, तो वही परहेज़गार (सुरक्षित) हैं। (33) उन्हीं के, लिए जो वह चाहेंगे उनके रब के यहाँ उपलब्ध होगा। और यही सदाचारियों (नेक लोगों) का प्रतिफल है।(34)


وَاَطِيۡعُوا اللّٰهَ وَاَطِيۡعُوا الرَّسُوۡلَ‌ۚ فَاِنۡ تَوَلَّيۡتُمۡ فَاِنَّمَا عَلٰى رَسُوۡلِنَا الۡبَلٰغُ الۡمُبِيۡنُ‏ ﴿۱۲﴾  اَللّٰهُ لَاۤ اِلٰهَ اِلَّا هُوَ‌ؕ وَعَلَى اللّٰهِ فَلۡيَتَوَكَّلِ الۡمُؤۡمِنُوۡنَ‏ ﴿۱۳﴾۔

[Q-64:12-13]

            तथा अल्लाह की आज्ञा का पालन करो तथा उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। फिर यदि तुम विमुख हुए, तो हमारे रसूल का दायित्व केवल स्पष्ट रूप से (उपदेश/क़ुरान) पहुँचा देना है।(12) अल्लाह वह है, जिसके सिवा कोई वंदनीय ( सच्चा पूज्य) नहीं है। अतः, ईमान वालों को अल्लाह ही पर भरोसा करना चाहिये।(13)


يٰۤاَيُّهَا الَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡۤا اَطِيۡعُوا اللّٰهَ وَاَطِيۡعُوا الرَّسُوۡلَ وَلَا تُبۡطِلُوۡۤا اَعۡمَالَـكُمۡ‏ ﴿۳۳﴾۔

[Q-47:33]

          हे ईमान वालों! आज्ञा मानो अल्लाह की तथा आज्ञा मानो उस के  रसूल की तथा व्यर्थ (नष्ट) न करो अपने कर्मों को।(33)


اِنَّ هٰذِهٖ تَذۡكِرَةٌ ‌ ۚ فَمَنۡ شَآءَ اتَّخَذَ اِلٰى رَبِّهٖ سَبِيۡلًا ﴿۱۹﴾۔

[Q-73:19].

           वास्तव में, ये (आयतें) एक शिक्षा (नसीहत) हैं। तो जो चाहे [इन के द्वारा] अपने रब की ओर राह बना ले।(19)


وَالَّذِيۡنَ اٰمَنُوۡا وَعَمِلُوا الصّٰلِحٰتِ وَاٰمَنُوۡا بِمَا نُزِّلَ عَلٰى مُحَمَّدٍ وَّهُوَ الۡحَقُّ مِنۡ رَّبِّهِمۡ‌ۙ كَفَّرَ عَنۡهُمۡ سَيِّاٰتِهِمۡ وَاَصۡلَحَ بَالَهُمۡ‏ ﴿۲﴾۔

[Q-47:2]

               तथा जो ईमान लाये और सदाचार (नेक अमल) किये तथा उस  (क़ुर्आन) पर ईमान लाये, जो मुह़म्मद पर उतारा गया है और (दरअसल) वह उनके रब  की ओर से सच है, तो उन [लोगों] से  उनके पापों को दूर कर दिया तथा उनकी दशा को सुधार दिया।(2)


فَاٰمِنُوۡا بِاللّٰهِ وَرَسُوۡلِهٖ وَالنُّوۡرِ الَّذِىۡۤ اَنۡزَلۡنَا‌ؕ وَاللّٰهُ بِمَا تَعۡمَلُوۡنَ خَبِيۡرٌ‏ ﴿۸﴾  يَوۡمَ يَجۡمَعُكُمۡ لِيَوۡمِ الۡجَمۡعِ‌ ذٰ لِكَ يَوۡمُ التَّغَابُنِ‌ ؕ وَمَنۡ يُّؤۡمِنۡۢ بِاللّٰهِ وَيَعۡمَلۡ صَالِحًـا يُّكَفِّرۡ عَنۡهُ سَيِّاٰتِهٖ وَيُدۡخِلۡهُ جَنّٰتٍ تَجۡرِىۡ مِنۡ تَحۡتِهَا الۡاَنۡهٰرُ خٰلِدِيۡنَ فِيۡهَاۤ اَبَدًا‌ ؕ ذٰ لِكَ الۡفَوۡزُ الۡعَظِیْمُ‏ ﴿۹﴾۔

[Q-64:8-9]

              अतः तुम ईमान लाओ अल्लाह तथा उसके रसूल  पर तथा उस नूर (क़ुरान) पर, जिसे हमने उतारा है तथा अल्लाह उससे, जो तुम करते हो भली-भाँति सूचित है।(8) जिस दिन वह तुम्हें एकत्र करेगा, एकत्र किये जाने वाले दिन। तो वह क्षति (बुरे कर्मों) के खुल जाने का दिन होगा और जो ईमान लाया अल्लाह पर तथा सदाचार (नेक कर्म) करता है, तो वह क्षमा कर देगा उसके दोषों को और प्रवेश देगा उसे ऐसे स्वर्गों में, जहाँ बहती होंगी नहरें, वे सदावासी होंगे उनमें। यही बड़ी सफलता है।(9)


  اِنَّاۤ اَنۡزَلۡنَا عَلَيۡكَ الۡكِتٰبَ لِلنَّاسِ بِالۡحَقِّ‌ ۚ فَمَنِ اهۡتَدٰى فَلِنَفۡسِهٖ‌ ۚ وَمَنۡ ضَلَّ فَاِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيۡهَا‌ ۚ وَمَاۤ اَنۡتَ عَلَيۡهِمۡ بِوَكِيۡلٍ‏ ﴿۴۱﴾۔

[Q-39:41]

             वास्तव में, हमने ही आपपर, लोगों के लिए सत्य के साथ ये पुस्तक [क़ुरान] अवतरित की है तो जिसने मार्गदर्शन (हिदायत) प्राप्त कर लिया, तो उसके अपने (लाभ के) लिए है तथा जो कुपथ हो गया, तो वह कुपथ अपने ऊपर होता है तथा आप उनपर संरक्षक नहीं हैं।(41)


نَحۡنُ اَعۡلَمُ بِمَا يَقُوۡلُوۡنَ‌ وَمَاۤ اَنۡتَ عَلَيۡهِمۡ بِجَـبَّارٍ  ࣞ‌ فَذَكِّرۡ بِالۡقُرۡاٰنِ مَنۡ يَّخَافُ وَعِيۡدِ ﴿۴۵﴾۔

[Q-50:45]

               तथा हम भली-भाँति जानते हैं उसे, जो कुछ वे कह रहे हैं और आप उन्हें बलपूर्वक मनवाने के लिए नहीं हैं। तो आप उन्हे क़ुर्आन द्वारा शिक्षा (नसीहत) दें, जो मेरी यातना (अज़ाब) से डरता हो।(45)

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अल्लाह नबी को अपना पक्ष रखने का आदेश देता है।

قُلۡ سُبۡحَانَ رَبِّىۡ هَلۡ كُنۡتُ اِلَّا بَشَرًا رَّسُوۡلًا‏ ﴿۹۳﴾  وَمَا مَنَعَ النَّاسَ اَنۡ يُّؤۡمِنُوۡۤا اِذۡ جَآءَهُمُ الۡهُدٰٓى اِلَّاۤ اَنۡ قَالُـوۡۤا اَبَعَثَ اللّٰهُ بَشَرًا رَّسُوۡلًا‏ ﴿۹۴﴾  قُلْ لَّوۡ كَانَ فِى الۡاَرۡضِ مَلٰۤٮِٕكَةٌ يَّمۡشُوۡنَ مُطۡمَٮِٕنِّيۡنَ لَـنَزَّلۡنَا عَلَيۡهِمۡ مِّنَ السَّمَآءِ مَلَـكًا رَّسُوۡلًا‏ ﴿۹۵﴾۔  

[Q-17:93-95]

            आप कह दें कि मेरा पालनहार पवित्र है, मैं तो बस एक रसूल (संदेशवाहक) मनुष्य हूँ।(93) और नहीं रोका लोगों को, कि वोह ईमान लायें जब कि लोगों के पास मार्गदर्शन (क़ुरान) आ गया, परंतु यह कि उन्होंने [अहंकार मे] कहाः क्या अल्लाह ने एक मनुष्य को रसूल बनाकर भेजा है?(94) (हे नबी!) आप कह दें कि यदि धरती में फ़रिश्ते निश्चिन्त होकर चलते-फिरते होते, तो हम अवश्य उनपर आकाश से कोई फ़रिश्ता रसूल बनाकर उतारते। (95)


وَاَنۡ اَتۡلُوَا الۡقُرۡاٰنَ‌ۚ فَمَنِ اهۡتَدٰى فَاِنَّمَا يَهۡتَدِىۡ لِنَفۡسِهٖ‌ۚ وَمَنۡ ضَلَّ فَقُلۡ اِنَّمَاۤ اَنَا مِنَ الۡمُنۡذِرِيۡنَ‏ ﴿۹۲﴾۔

[Q-27:92]

          तथा क़ुर्आन पढ़ते रहो, तो जिसने सुपथ अपनाया, तो उसने अपने ही लाभ के लिए सुपथ अपनाया और जो कुपथ हो जाये, तो आप कह दें कि वास्तव में, मैं तो बस सावधान करने वालों में से हूँ।(92)


فَاِنَّكَ لَا تُسۡمِعُ الۡمَوۡتٰى وَلَا تُسۡمِعُ الصُّمَّ الدُّعَآءَ اِذَا وَلَّوۡا مُدۡبِرِيۡنَ‏ ﴿۵۲﴾  وَمَاۤ اَنۡتَ بِهٰدِ الۡعُمۡىِ عَنۡ ضَلٰلَتِهِمۡ‌ؕ اِنۡ تُسۡمِعُ اِلَّا مَنۡ يُّؤۡمِنُ بِاٰيٰتِنَا فَهُمۡ مُّسۡلِمُوۡنَ‏ ﴿۵۳﴾۔

[Q-30:52-53]

                तो (हे नबी!) आप नहीं सुना सकेंगे मुर्दों  को और नहीं सुना सकेंगे बहरों को पुकार, जब वे भाग रहे हों, पीठ फेरकर।(52) और आप अंधों को उनके कुपथ से सीधे मार्ग पर नहीं ला सकते। आप सुना सकेंगे उन्हींको, जो हमारी आयतों पर ईमान लाते हैं, फिर वही मुस्लिम हैं।(53)


 

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